रविवार, 7 जून 2020

बीज (साहिल नायक पैगाम)


     छंद---मनहरण घनाक्षरी 
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छींच आया बीज देखो 
किया खूब काम देखो 
बनता है इसी से तो 
देश ये महान है |

तर-तर धरे माथ 
भीगे पाँव पसीना में 
पेट पलता है देखो 
इसी से जहान है |

गुम हुआ बेचारे तो 
ना किसी को फिकर है 
श्रमवीर दानवीर 
किसे पहचान है |

जलेगा दीपक कभी 
होगा उजियारा तब 
किरदार आएगा कि 
चेहरा किसान है |


रचनाकार-
साहिल नायक"पैग़ाम"
9340389771

बीज (तोषण चुरेन्द्र दिनकर)


विधा :-घनाक्षरी
दिनाँक :-7/6/20
दिन :-रविवार
विषय :-बीज
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..............भारती किसान प्यारे,
..........धरती के हैं दुलारे
....खेतों में ये बीज बोयें,
हलबा महान है।।1।।

............बरसे प्रेम प्रकृति की,
........बीज हुआ अंकुरित,
....लेकर जनम नया,
भरे परवान है।।2।।

............नव रंग जब चढ़ा,
.........सीना ताने वृक्ष खड़ा,
....राहगीर बैठ छाँव,
मिटाते थकान है।।3।।

...........पक कर बीज बनो,
........परहित काज करो,
....नाज करे सारा जहां,
करे गुणगान है।।4।।
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तोषण चुरेन्द्र 'दिनकर'
डौंडी लोहारा बालोद

शुक्रवार, 5 जून 2020

धोखा खाय हँव(रोहित ,पार्री बड़गांव)

💘,,,,,,,,,,,💘,,,,,,,,,,💘
हं धोखा बहुत मय  हर खायेंव।
पल पल आंसू मय हर बहायेंव।

कोन कर ही ग अब भरोसा मोर।
देवी बना के रखेंव दिल  म मोर।।
लूट डारिस बैरी लबरी के लबारी।।
अउ पूजेंव ओला जइसे मे पुजारी।।

मया म दगा बस मय हर पायेंव ।
पल पल आंसू मय हर बहायेंव।।

लइस  कफ़न बइरी हर संउक ले।
अउ फेक के चल दिस चंउक ले।।
आ बैठ गे मोर मैयत के पंगत म।
खूब हसिस दोगली चार संगत म।।

हं धोखा बहुत मय हर खायेंव।
पल पल आंसू मय हर बहायेंव।
         💘रोहित बारले💘

सिरतो मा आ जाना (कन्हैया लाल बारले ,कोचेरा)

💗सिरतो म आ जाना 💗

सपना मा नइ  आवास त,
 नइ  देवंव  मेहा गारी ।
सिरतो मा तैंहा  
मोर आना संगवारी ।
(1)
पहिली नजर म तैं ,
मोर मन ल  भाये  ।
आंखी  आंखी  म तैं ,
मया गोठियाये  ।
(कहां लुकाये तैंहा,,,,)2 
मया होगे भारी ।,,,,,
सिरतो म तैंहा  
मोर आना संगवारी ।,,,,,,,,
(2)
आंखी  के रद्दा ले तैं ,
 जिनगी म मोर आये ।
मया गोठिया के तैं ,
मन ल मिलाये ।
(जिनकी भर तोला मया करहुँ)2  मैं नइ कहंव  लबारी ।
सिरतो म तैंहा  
मोर आना संगवारी ।,,,,,,,,
(3)
तोर बिना मोर ,
जिनकी हावे सूना ।
मया के आगी  भड़के ,
जइसे पानी म चूना ।
(सिरतो म आजा ना तैं)2
तोला बनाहुँ मोर सूवारी ।
सिरतो म तैंहा 
मोर  आना संगवारी ।
(4)
तोर आये  ले जिंनगी के बगिया, हरीयर हरीयर होही ।
तोर कोरा म फूल फूलही ,
भरोसा हावे मोर जोही ।
 (सुनता ले हमन जिंनगी पहाबो)))2
 अंगना म होही किलकारी ।
सिरतो म तैंहा  
मोर आना संगवारी,,,,,,,


✒️कन्हैया लाल बारले✒️
कोचेरा डौन्डी लोहारा 
जिला बालोद (छत्तीसगढ़)

विश्व पर्यावरण (हर्षा देवांगन 'हर्षराज)

मेरी नई रचना (विश्व पर्यावरण दिवस पर)
दिल की कलम ✍️ से.... 


वट की जड़ें होती गहरी 
सिखा देती पीपल ज्ञान 
नीम सदा कड़वाहट देता 
न कभी सहता अपमान 

रसों में है आंवले का रस 
जीवन में अपना लेना तुम 
कर लें मित्रता बबूल से 
इसका गुण न भुला देना तुम 

कर ले सुरक्षित जीवन अपना
जग को सारे महकाना है 
गुण चंदन का करके धारण 
जीवन में अपनाना है 

कंदमूल जड़ी बूटी सारे
फल फूल सभी का है कहना 
मत कम से आँकों तुम मुझे 
हम हैं हर प्राणी का गहना 

कितनी सुंदर है धरती 
रूप प्रकृति और पर्यावरण 
सब की जीवनदाती प्रकृति का 
हम मिलकर करते हैं संरक्षण 

जैसे बारिश की टिप-टिप बूंदे 
सबके मन को है भाती 
हरा भरा प्रकृति सौंदर्य से 
सबको है जीवन दे जाती 

आओ सब मिल एक पेड़ लगाए 
करते रहें जग का कल्याण 
हम सुधरेंगे जग सुधरेगा
तभी तो बनेगा देश महान

श्री मती हर्षा देवांगन ' हर्षराज '
मधुर साहित्य परिषद डोंडी लोहारा

वो करीब आयी दफनाने के बाद (आर.एस.बारले)

यादें (यमन पिस्दा)

प्रकृति (गजेंद्र साहू कोड़ेकसा)

🌳🌳 पेड़ लगाव धरती बचाव🌳🌳

प्रकृति ल संवारे बर सब मिल के तैयार हो
उजड़े झन प्रकृति ये हम सब के प्रयास हो
जगाव अब बचावव सृष्टि के आधार ला
पेड़ लगाव बचाव जीवन अउ संसार ला 

पेड़ काटत हे अंधाधुन तेजी ले चारो ओर
साफ करके जंगल फैक्ट्री लगाए देवत हे जोर
धुआं निकलत हे जानलेवा सांस लेना दूबर होगे 
पर्यावरण उरकगे मनखे बेअधर होगे

जिंदगी में जहर घोल दे मनखे  परेशान हे
लोगन हर प्रभावित होगे जंगल खाली सुनसान हे
पर्यावरण बचाओ सबो जग ला बचाना हे
पेड़ लगा के मानव जीवन ल सुखी बनाना हे 
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
पर्यावरण दिवस के अवसर म मोर नानकुन रचना आप सबों के बीच में 
🌳🌳🌳🌳🌳🌳
     रचना
   गजेंद्र साहू
   कोड़ेकसा
🙏🙏🙏🙏🙏

गुरुवार, 4 जून 2020

बी ए पास बहुरिया( गजेन्द्र साहू कोडेकसा)

बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे-
रचना :-गजेन्द्र साहू ,कोडेकसा

 जिनगी दुबर होगे मोर अटके खाली आस हे,
बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे
झाड़ू पोछा बेटा करते घर के भरथे पानी 
पढ़ लिख के अढ़हा होगे काला बताव कहानी 
दाई ददा राक्छस होगे देवता ओखर सास हे 
बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे

जबले बहू घर म आहे टीवी ला नई छोड़य 
आघु पछू नाचते टूरा हर संग नई छोड़े 
रोज तिहार हाबे उखर बर हमर बर उपास हे 
बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे

होवत बिहनिया बदलगे बेटा देथे हमला गारी 
अपन घर हर भुतहा होगे मंदिर होगे ससुरारी 
भाई भाई झगड़ा होथे सारा ओखार खास हे 
बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे

पाल पोस के देखे सपना गाड़ा गाड़ा 
होवत बीहनिया बदलगे बेटा अइसन पढ़ीहिस पहाड़ा 
हमर सपना हर जुछछा होगे कहिथे सब बकवास हे 
बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे

समधी घालो केहे रीहिस मोर बेटी जेखर घर म जहीं 
ओकर घर दुए दिन सरग बनाही 
बेटा बहू के राज मा सरग जाबो ये सब बकवास हे 
बेटा आठवीं फेल बहू बी ए पास हे ,,,,




आज की स्थिति को देखते हुए ये रचना बनाया हूं आज दिन बदिन 
सोच उल्टा होता जा रहा है इन्हीं बातो को ध्यान रखते हुए ,,


         रचना 
       गजेन्द्र साहू 
       कोडेकसा
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

शनिवार, 16 मई 2020

वक्त गुजरा हुआ


रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव ( छ.ग.)
विधा -- गीत 
शीर्षक --  "वक्त गुजरा हुआ "
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वक्त गुजरा हुआ ,फिर याद आया ।
कोई भूला हुआ ,फिर याद आया ।।
               ****************
                भूलने की कोशिश में ,
                दूर होते गए ।
                ये दुरियां ही ,
                हमें करीब लाया ।।1।।
               ******************
भूला भी नहीं उन्हें ,याद करता भी नहीं ।
भूलने की कोशिश ने, दिल में कहर ढा़या।।2।।
            *******************
              वो तो कहते हैं बेखबर ,
              हम उनसे हो गए ।
              उनकी बातें ही ,
              दिल जिगर में छाया ।।3।।
          *********************
तस्वीर दिल में ,आँखों में बरसात है ।
प्यास आँखों में ,हमने कोई पाया ।।4।।
          ******************
          वक्त गुजरा हुआ ,
          फिर याद आया ।
          कोई भूला हुआ ,
          फिर याद आया ।।5।।

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व्याख्या  --  
उपरोक्त पंक्तियों में मैने प्रेम की उस स्थिति को उकेरने का प्रयास किया है जब प्रियतमा अपनी प्रियतम से बिछड़ जाती है तब उनके ह्रदय की दशा क्या होती है ।दोनों ही बिते हुए क्षण और भूले , बिछडे़ साथी को याद करते हैं ।और भूलने की कश्मकश में वे यादों के सहारे और भी अधिक करीब आ जाते हैं ।पहले तो दोनों ही ना तो एक दुसरे को स्मरण करते थे ना ही भूले थे ,परन्तु भूलने की कोशिश ने विरह अग्नि को और भी प्रबल कर दिया ।दोनों ही एक दुसरे पर भूल जाने का मिथ्या दोषारोपण करते हैं  पर ऐसा नहीं है , इन दोनों के दिल दिमाग मे हर जगह वे ही समाहित होते हैं ।दोनों के मन में विरह के कारण साथी की ही मूरत मन में बसी थीऔर नैन एक झलक के लिए प्रियतम ,प्रियतमा के निरंतर अश्रु बरसात करते हैं इसके बाद भी आँखों में यार के लिए कैसी प्यास थी ।।
         रचनाकार 
  प्रवीण कुमार ठाकुर 
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बुधवार, 29 अप्रैल 2020

प्रवीण के दोहे

शब्द बड़े अनमोल हैं ,
          समझो इनके मोल ।
घात करे बड़ जोर है  ,
          बोल सदा रस घोल ।।

राम नाम नित सुमर के ,
          श्री गणेश कर काज ।
सत्य राह पर उतर के  ,
          जीवन अपने साज  ।।

       🙏शुभ प्रभात 🙏
🌼🌸प्रवीण ठाकुर✍🏻🌸🌼

रंग जीवन के

कलम की सुगंध छंदशाला
नमन मंच
19/04/20
घनाक्षरी
-रंग जीवन के

रंग अंग भीगे रंग लेकर नई उमंग,
दिन रहो होली रात दिवाली मनाइये।

सरसो के रंग लिए हियरा जो भंग 
पिए,
आम बन डाल पर मन को लुभाइये।

हरी हरी धरती ये शीतल जो करती ये,
झरझर नदियों सा,तरंग जगाइये।

सुख दुख संग लिये,जीवन में रंग लिये,
बांट चले भाईचारा रंग ये चढ़ाइये।

-तोषण दिनकर

साहित्यकार नहीं



अब लड़ना हमे है धर्म युद्ध
आयेगा कोई अवतार नही
देखे मुक दर्शक बन तम्आशा
वो कोई साहितकार नही

जयचंदो की जयचंदी भी
अब और हमे स्वीकार नही
जो चीख न सुने अपनो का
उससे बढकर गद्दार नही

वो कायर है उनपे लानत है
इंसानो से जिनको प्यार नही
ये हृदय विदारक घटना है
कोई झूठा अखबार नही

ये, संतो की है कुर्बानी
जायेगा कभी बेकार नही
निर्दोषो का जो प्राण हरे
इन कुत्तो को अधिकार नही

अन्याय अत्याचार ले लड़ना
जिन लोगो को स्वीकार नही
जंग लग चुकी कलम मे जिसकी
वो कोई साहितकार नही

-परमानंद प्रकाश

मनमौजी

1.
गुंगे बहरे हो चले,माने कभी न बात।
अपनी धुन में हाँकते,दिन हो चाहे रात।
दिन हो चाहे रात,रहो करते मनमानी।
मिलकर अपना देश,बात ये सबने ठानी।
लगी चाल पर रोक,लगे है लाखों पहरे।
गाँव ठाँव में लोग,फिरे है गुंगे बहरे।

2.
रहती जिसमें है अकड़,सुखे वृक्ष वो जान।
निन्दा उसके भाग में,पाये कभी न मान।
पाये कभी न मान,लाख जो ठोकर खाते।
खोते अपने लोग,छुटे हैं सारे नाते।
कह दिनकर कविराज,मीठ जो मधुरस बहती।
बोल बड़े अनमोल, हिया के भीतर रहती।

-तोषण दिनकर

किताब

विश्व किताब दिवस म नानकुन कुण्डलियाँ


बाँटे सगरो बात सुन,जेकर निही हिसाब।
हवय ज्ञान के कोठरी,कहिथे सखा किताब।
कहिथे सखा किताब,सुनव गा संगी भइया।
बने गोठ सब राख,गलत ला देवव तिरिया।
कह तोषण कविराज,गजब के बतिया छाँटे।
बानी रोठ किताब ,ज्ञान के सागर बाँटे।

-तोषण दिनकर

बाकी है

*बाकी है...*

मुश्किलों के दौर में एक आस बाकी है।
दूर तुम भी दूर हम भी एहसास बाकी है।

सम्हाले रख्खा है अब तलक ये दिल को,
आने को अभी नया मधुमास बाकी है।

जल्द मिटेंगे गिले शिकवे बुरे वक्त सारे,
दिन नव किरण का पल खास बाकी है।

सुनी पड़ी मधुबन ओ कान्हा रसिया की,
सुर्ख हुए वृंदावन की महारास बाकी है।

चाहत "दिनकर" की मिलने की तुझसे,
करने को बस रब से अरदास बाकी है।


-तोषण कुमार "दिनकर"

देवनारायण नगरिहा की रचना

कोरोना

कोरोना दुखहि दुनिया ला रोववत हे।
कतको ला मौत के नींद सोववत हे।।
स्वाइन फ्लू ला ज्यादा भयंकर बीमारी बतावत हे।
हाहाकार मचे दुनिया मा सब झन गोठियावत हे।।
बुखार, सर्दी, खाँसी एकर लक्षण बतावत है।
बड़ा मुश्किल म फसे जिनगी सब झन गोठियावत हे।।
सरकार कतको बेवस्था करत हे।
इलाज करैया डॉक्टर घलो मरत हे।।
मुँह ला तोपवत हे, हाथ ला धोववत हे।
दूरिहा दुरिहा रहो करके बतावत हे।।
देश दुनिया ला भले आवो, कोरोना के जांच करना हे।
नई मानहु बात नगरिहा के सीधे नरक जाना हे।।
जिनगी के दुश्मन होंगे कॅरोना सब बतावत हे।
आना जाना झन करो ,घर मे रहना सब समझावत हे।।
घर मे परे रोना लेवत हे बैरी जान कॅरोना ।
नींद नई परे बैरी हराम होंगे बोर सोना।।
चौउर दार गेस रुपया सरकार दिही नगरिहा बतावत हे।
कॅरोना दुखहि दुनिया ला रोववत है ।।

 इतिहास कोरोना

वीरान हो जाएगी ये धरा,
चौकसा घेर लिया है कॅरोना। 
जिधर भी उठी ये निगाहें, 
है जग में रोना ही रोना।।
विकास की गंगा में ,
है डूबती बहती लाशें।
कोई तो उन्हें समझाये ,
है वो कैसे जीवन के प्यासे।।
स्पेन ,इटली ,चीन ,अमेरिका,
विश्व पटल में कोरोना का रोना।
बन गयी लाशों की राजधानी,
किसे कहाँ चैन से है सोना।।
जुल्म की अंधी रात में ,
फूटा कॅरोना का कहर।
सुबह ये बगावत का पहरा,
फैला मानव मे कॅरोना का जहर।।
बेकाबू बनाओ राज करो,
है नई इतिहास कोरोना।
युद्ध मे पीड़ितों की आवाज ,
है यहाँ अपनों को ही खोना।।
अणु परमाणु बम से नही लड़ाई,
कोरोना युद्ध मे उलझा जीवन।
अब कत्ल नही सीधा मौत ,
कोरोना से संक्रमित जीवन।।
कल तक दंगे कराये,
फैलाये वैमनस्यता मानव मन में।
कोई तो उपाय बताओ,
कोरोना का जहर फैल रहा जन मन में ।।
न दवाई न सुरक्षा कवच,
हाथ धोता हूँ,रोता भी हूँ।
नसीब नही मुर्दो को कफ़न,
जागकर सोता हूँ, रोता भी हूँ।।
खुशहाली जीवन बनाना है सजग रहो,
हराना है जहरीले कॅरोना।
हम हर सुविधा दे रहे है ,
कहे नगरिहा नही पड़ेगा रोना।।

कहा ले आइस ये बैरी ले कोरोना

कहा ले आइस ये बैरी ले कोरोना
मनखे ला मारत हे कहे रे कोरोना
घर मे खुसरे खुसरे होंगे ग मरना।
ए ग भइया कोई तो कुछ कोरोना।
बाई कहे इलाज के दवा हे करोंदा।
कान म खोच लुहु तहू मन दौना।।
लाली तोर धोवा जातिस रोगहा चीनी।
घरे में पर जातिस रे तोर रोना।।
बीमारी ला बगरावात हे जमाती पठान।
बिकट करलई हे गा भगवान।।
नगरिहा कहे गजब हवे गा ये डरौना।
काबर अईसन करे रे बैरी गढ़ो ना।।

शिल्पीकार

मैंने धनिकों का नाम
मंदिरो, भवनों ,अजूबो पर देखा है।
मैंने अजूबों पर एक
अजीब चित्र देखा है।।ब
लहू ,पसीना,मेहनत, लगन
श्रमिको का नाम नही, काम देखा है।
अपने लिए नही दुसरो के लिए ,
हर चित्र गढ़ते देखा है।।
अपंग, असहाय, चिथड़े ,मैले वसन में,
उस हुनरदार को भूखे पेट देखा है।
टपकती मोती, दोपहरी की धूप में,
राष्ट्र की नींव मजबूत बनाते देखा है।।
लथपथ लहू से, शिल्पीकर के हाथों को ,
मैंने गुलदस्ता से मैंने नही देखा है।
मान्यवर उदघाटन कर्ता का नाम,
निर्मित संगमरमर के पत्थरों में देखा है।।
समय समय पर शिल्पीकार बदलते देखा है,
हर क्षण मौसम को बदलते देखा है।
जिसने सारी दुनिया बदल दी,
उसे हमने कभी बदलते न देखा है।।
तुमने कला को अभिवृत्ति चित्र में उकेरा ,
पसीने में रंगों को मैंने घुले देखा है।
पेट को तुमने सदा दिखाया,
जिंदगी को कभी रंगीन नही देखा है।।

देवनारायण नगरिहा जनकवि 
ग्राम रायपुरा पोस्ट संबलपुर
तहसील डोंडी लोहरा 
जिला बालोद छत्तीसगढ़

सुन मेरे भगवान

सुन मेरे भगवान सुन मेरी पहचान बनादे।
आदमी हूँ आदमी मुझे बस इंसान बनादे।

नफरत न हो किसी से जब तक है जिंदगी ,
जान बीते खातिरदारी में मेजबान बनादे।

सहारा बेसहारों का भूखे का निवाला बनूँ,
बढ़ाता चलूँ सबकी कद कदरदान बनादे।

रखूँ समेट कर ये सारे गुलशन जहाँ का,
मुस्कुराते गुलों का मियाँ बागबान बनादे।

फक्र करे तुझ पर दिनकर ए आसमान,
खुशियों से भरा एक हिन्दुस्तान बनादे।

तोषण कुमार चुरेन्द्र " दिनकर"

प्रीत

तुझ संग प्रीत लगाने की सजा क्या है।
बतादे मुझको ऐ खुदा तेरी रजा क्या है।
लाख बहाने करती हूँ तेरा दीदार हो जाये,
हजार नखरे और चेहरे तेरी अदा क्या है।

-तोषण दिनकर

छंद के छ स्थापना

मोर छंद के छ परिवार के स्थापना दिवस म संस्थापक गुरुदेव अरुण कुमार जी निगम के संग सबो छंदकार मन ला बधाई...

गुरू ज्ञान के कोठरी,बाँटे नित्य सज्ञान।
बिन माँगे आशीष दे,कारज करे महान।।१।।

अपनी चिन्ता छोड़कर,सदा बाँटते ज्ञान।
देकर के आशीष सब,गढ़ते शिष्य  सुजान।।२।।

गुरू चरण मे शीश दो,लेलो भरभर ज्ञान।
मिले ज्ञान को बाँट लो,कारज यही महान।।३।।

बिना गुरू के ज्ञान नहीं,पोथी पढ़ो पुरान।
लेने शिक्षा स्वयं गये,राम कृष्ण भगवान।।४।।

दर्श किये भगवान का,बालक ध्रुव प्रहलाद।
नारद जैसे गुरु मिले,जनम हुआ आबाद।।५।।

अरुण निगम गुरुदेव जी,मिले सदा आशीष।
छंद के छ परिवार ये,चमके लाख बरीष।।६।।

-तोषण दिनकर