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बुधवार, 29 अप्रैल 2020

मनमौजी

1.
गुंगे बहरे हो चले,माने कभी न बात।
अपनी धुन में हाँकते,दिन हो चाहे रात।
दिन हो चाहे रात,रहो करते मनमानी।
मिलकर अपना देश,बात ये सबने ठानी।
लगी चाल पर रोक,लगे है लाखों पहरे।
गाँव ठाँव में लोग,फिरे है गुंगे बहरे।

2.
रहती जिसमें है अकड़,सुखे वृक्ष वो जान।
निन्दा उसके भाग में,पाये कभी न मान।
पाये कभी न मान,लाख जो ठोकर खाते।
खोते अपने लोग,छुटे हैं सारे नाते।
कह दिनकर कविराज,मीठ जो मधुरस बहती।
बोल बड़े अनमोल, हिया के भीतर रहती।

-तोषण दिनकर

किताब

विश्व किताब दिवस म नानकुन कुण्डलियाँ


बाँटे सगरो बात सुन,जेकर निही हिसाब।
हवय ज्ञान के कोठरी,कहिथे सखा किताब।
कहिथे सखा किताब,सुनव गा संगी भइया।
बने गोठ सब राख,गलत ला देवव तिरिया।
कह तोषण कविराज,गजब के बतिया छाँटे।
बानी रोठ किताब ,ज्ञान के सागर बाँटे।

-तोषण दिनकर

गलती

गलती मेरी ज्ञात हो,हम भी है हकदार।
रोक टोक हमपे करो,जरा करो उपकार।
जरा करो उपकार,बात तो सच्ची बोलो।
कमी कहाँ पर भार,राज भी अपनी खोलो।
कह दिनकर कर जोड़,बात ही सच्ची फलती।
हमसे मुँह मत मोड़,सभी मिल पकड़े गलती।

-तोषण दिनकर