1.
गुंगे बहरे हो चले,माने कभी न बात।
अपनी धुन में हाँकते,दिन हो चाहे रात।
दिन हो चाहे रात,रहो करते मनमानी।
मिलकर अपना देश,बात ये सबने ठानी।
लगी चाल पर रोक,लगे है लाखों पहरे।
गाँव ठाँव में लोग,फिरे है गुंगे बहरे।
2.
रहती जिसमें है अकड़,सुखे वृक्ष वो जान।
निन्दा उसके भाग में,पाये कभी न मान।
पाये कभी न मान,लाख जो ठोकर खाते।
खोते अपने लोग,छुटे हैं सारे नाते।
कह दिनकर कविराज,मीठ जो मधुरस बहती।
बोल बड़े अनमोल, हिया के भीतर रहती।
-तोषण दिनकर
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