कोरोना
कोरोना दुखहि दुनिया ला रोववत हे।
कतको ला मौत के नींद सोववत हे।।
स्वाइन फ्लू ला ज्यादा भयंकर बीमारी बतावत हे।
हाहाकार मचे दुनिया मा सब झन गोठियावत हे।।
बुखार, सर्दी, खाँसी एकर लक्षण बतावत है।
बड़ा मुश्किल म फसे जिनगी सब झन गोठियावत हे।।
सरकार कतको बेवस्था करत हे।
इलाज करैया डॉक्टर घलो मरत हे।।
मुँह ला तोपवत हे, हाथ ला धोववत हे।
दूरिहा दुरिहा रहो करके बतावत हे।।
देश दुनिया ला भले आवो, कोरोना के जांच करना हे।
नई मानहु बात नगरिहा के सीधे नरक जाना हे।।
जिनगी के दुश्मन होंगे कॅरोना सब बतावत हे।
आना जाना झन करो ,घर मे रहना सब समझावत हे।।
घर मे परे रोना लेवत हे बैरी जान कॅरोना ।
नींद नई परे बैरी हराम होंगे बोर सोना।।
चौउर दार गेस रुपया सरकार दिही नगरिहा बतावत हे।
कॅरोना दुखहि दुनिया ला रोववत है ।।
इतिहास कोरोना
वीरान हो जाएगी ये धरा,
चौकसा घेर लिया है कॅरोना।
जिधर भी उठी ये निगाहें,
है जग में रोना ही रोना।।
विकास की गंगा में ,
है डूबती बहती लाशें।
कोई तो उन्हें समझाये ,
है वो कैसे जीवन के प्यासे।।
स्पेन ,इटली ,चीन ,अमेरिका,
विश्व पटल में कोरोना का रोना।
बन गयी लाशों की राजधानी,
किसे कहाँ चैन से है सोना।।
जुल्म की अंधी रात में ,
फूटा कॅरोना का कहर।
सुबह ये बगावत का पहरा,
फैला मानव मे कॅरोना का जहर।।
बेकाबू बनाओ राज करो,
है नई इतिहास कोरोना।
युद्ध मे पीड़ितों की आवाज ,
है यहाँ अपनों को ही खोना।।
अणु परमाणु बम से नही लड़ाई,
कोरोना युद्ध मे उलझा जीवन।
अब कत्ल नही सीधा मौत ,
कोरोना से संक्रमित जीवन।।
कल तक दंगे कराये,
फैलाये वैमनस्यता मानव मन में।
कोई तो उपाय बताओ,
कोरोना का जहर फैल रहा जन मन में ।।
न दवाई न सुरक्षा कवच,
हाथ धोता हूँ,रोता भी हूँ।
नसीब नही मुर्दो को कफ़न,
जागकर सोता हूँ, रोता भी हूँ।।
खुशहाली जीवन बनाना है सजग रहो,
हराना है जहरीले कॅरोना।
हम हर सुविधा दे रहे है ,
कहे नगरिहा नही पड़ेगा रोना।।
कहा ले आइस ये बैरी ले कोरोना
कहा ले आइस ये बैरी ले कोरोना
मनखे ला मारत हे कहे रे कोरोना
घर मे खुसरे खुसरे होंगे ग मरना।
ए ग भइया कोई तो कुछ कोरोना।
बाई कहे इलाज के दवा हे करोंदा।
कान म खोच लुहु तहू मन दौना।।
लाली तोर धोवा जातिस रोगहा चीनी।
घरे में पर जातिस रे तोर रोना।।
बीमारी ला बगरावात हे जमाती पठान।
बिकट करलई हे गा भगवान।।
नगरिहा कहे गजब हवे गा ये डरौना।
काबर अईसन करे रे बैरी गढ़ो ना।।
शिल्पीकार
मैंने धनिकों का नाम
मंदिरो, भवनों ,अजूबो पर देखा है।
मैंने अजूबों पर एक
अजीब चित्र देखा है।।ब
लहू ,पसीना,मेहनत, लगन
श्रमिको का नाम नही, काम देखा है।
अपने लिए नही दुसरो के लिए ,
हर चित्र गढ़ते देखा है।।
अपंग, असहाय, चिथड़े ,मैले वसन में,
उस हुनरदार को भूखे पेट देखा है।
टपकती मोती, दोपहरी की धूप में,
राष्ट्र की नींव मजबूत बनाते देखा है।।
लथपथ लहू से, शिल्पीकर के हाथों को ,
मैंने गुलदस्ता से मैंने नही देखा है।
मान्यवर उदघाटन कर्ता का नाम,
निर्मित संगमरमर के पत्थरों में देखा है।।
समय समय पर शिल्पीकार बदलते देखा है,
हर क्षण मौसम को बदलते देखा है।
जिसने सारी दुनिया बदल दी,
उसे हमने कभी बदलते न देखा है।।
तुमने कला को अभिवृत्ति चित्र में उकेरा ,
पसीने में रंगों को मैंने घुले देखा है।
पेट को तुमने सदा दिखाया,
जिंदगी को कभी रंगीन नही देखा है।।
देवनारायण नगरिहा जनकवि
ग्राम रायपुरा पोस्ट संबलपुर
तहसील डोंडी लोहरा
जिला बालोद छत्तीसगढ़
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